मंगलवार, 21 सितंबर 2010

एक प्रेमिका अपनी कोमल भावनायें अपने प्रेमी के सामने कुछ इस से तरह रखती है.

काश!

काश! तुम ऐसे होते,
जेठ की दोपहरिया में,बरगद की छाव हो जैसे.
प्यासे पथिक के मुहँ में,दो बूंद पानी हो जैसे.
अंधेरी गली में जला वो,एक मात्र दीपक हो जैसे.

काश! मैं ऐसी होती
तुम्हारी मजबूत बरगद की डाली से,
लिपटी वो कोमल लतायें हो जैसे .
उस अंधेरी गली में जलने वाले, 
एक मात्र दीपक की बाती हो  जैसे.
तुम्हारे जीवन की एक मात्र नायिका हो जैसे.

काश! तुम-मैं ऐसे होते 
तुम चाँद तो मैं तुम्हारी चाँदनी हो जैसे.


  


3 टिप्‍पणियां:

  1. "काश" काफी अच्छा लगा और :मिस" कॉल तो पहले से पढ़े थे हा वैसे तुम उतना भी बुरा नै लिखती हो

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  2. अच्छी प्रस्तुति.
    और उम्दा लिखिए.

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  3. बहुत खूबसूरत भाव हैं.........

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